शनिवार, 8 सितंबर 2018

मुदित हुई

   
बात उन दिनो की है जब मेरी नई-नई शादी हुई थी। शादी के दो-तीन दिनो के बाद सब मेहमान घर से चले गये। घऱ पर कुछ लोग ही रह गये थे।
सासू माँ ने कहाः- बहु जाओ बेटे को खाना दे आओ। मैं जब खाना देने गये तो वो पहले से ही आसन पर बैठे थे। मैं सर पर पल्लू डाले ही खाना देकर उनके सामने बैठ गयी। और बोली खाईये जी! तब वह बोले तुम भी मेरे साथ खाओ। मैं बोली आप खा लिजिए मैं बाद में खा लूगी। और वो खाना खाने लगे। और मैं बैठे-बैठे उनका मुँह निहार रही थी।
कुछ देर के बाद वह बोलेः- आपके घर मे कौन-कौन है? मैंने घर के सभी लोगो का परिचय बताया। फिर बोले आपके घर मे कुत्ता है, कि नही?
मैने बोलीः- कुत्ता तो नही लेकिन, कुतिया है घर में।
फिर वह बोले जब आप खाना खाती हो तो कुतिया क्या करती है?
मैं बहुत भोलेपन से बोली। वह हमारा मुँह देखती है।
कुछ देर बाद वह शान्त हो गये। मैं अभी भी उनका मुँह निहार रही थी।
फिर दुवारा बोलेः- कुतिया क्या करती है, मैं फिर बोली कुतिया मेरा मुँह ही देखती है।
अचानक मेरा ध्यान भंग हुआ। “कुतिया मेरा मुँह देखती है” उस पर मेरा ध्यान गया। मैं तो अभि भी उन्ही को निहार रही थी। मैं शर्मिंदा होकर अपना मुँह अपने हाथो से छुपा लिया। मुझे काफी लज्जा आयी। फिर वो मेरी ओर देखकर हँसने लगे, अब मुझे भी हँसी आ गयी।
दरअसल वह चाह रहे थे कि खाना एक साथ खाया जाय, एक ही थाली मे। लेकिन मैं नई नवेली दुल्हन मन मे काफी लज्जा संकोच था, इसीलिए मना कर दी कि, आप खाईये मैं बाद मे खा लुंगी।
आज मेरे दो बच्चे है।लेकिन जब भी वो बात याद आती है तो मुँख पर मुस्कान स्वतः ही तैर जाती है।                       
                              समाप्त                  21.07.2010 सिलीगुड़ी

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