शनिवार, 8 सितंबर 2018

माँ का प्यार

राहुल इलाहाबाद में रहता था। वह वही पर रहकर पढ़ाई करता था। वह गर्मियों की छुट्टी या जब कोई त्योहार पड़ता तब ही घर जाता था। राहुल जब भी घर जाता तो उसकी माताजी बहुत सारी चीजें उसे बाँध देती थी कि राहुल को कुछ कमी न हो। दाल,चावल,देसी घी, अचार, पापड़, तथा बहुत सारी चीजे जिससे राहुल को कुछ परेशानी न हे। राहुल बहुत आदर से उसको ले आता था और पूरे तीन-चार महीने बड़े ही आराम से कट जाता था।
कुछ दिनों बाद ही राहुल की नौकरी लग गयी । वह अब घर जाता तो माँ को बोल देता कि माँ जब मैं अपने  काम पर जाँऊ तो कुछ मत देना ट्रेन में बहुत ही परेशानी होती है। एक तो दो-दो बैग रहता है उपर से ये भरा हुआ बैग दे देती हो जिससे कि बहुत ही परेशानी होती है। राहुल अच्छी तरह जानता था कि माँ मानने वाली नहीं है।
इस बार गर्मियों की छुट्टी में फिर राहुल घर गया। जब आने लगा तो माँ ने फिर बहुत सारा समान बाँध दी थी। और बोली कि इसे कुली से चढ़वा लेना। राहुल अपनी माँ पर बहुत ही गुस्सा होता था। वह सारा सामान कहीं घर में ही छुपा दिया था। जब चलने लगा तो माँ वह बैग न देखकर ताड़ लिया और कहीं से खोजकर फिर वह बैग मेरे हवाले किया था। न चाहते हुए भी मुझें ले आना पड़ा था।
कुछ दिनों बाद ही राहुल की शादी हो गयी। एक नन्हा-मुन्ना भी घर में आ गया। राहुल फिर छुट्टीयों में घर आया था। जब फिर वह घर से जाने लगा तो माताजी ने इस बार कुछ ज्यादा ही सामान दे दी थी। स्टेशन पर किसी तरह से पहुँच गया था। जब ट्रेन आयी तो वह ट्रेन में चढ़ने नही सका था। एक तो पहले से ही तीन-चार बैग उसके पास थे  और माताजी का दिया हुआ भी भारी बैग भी उसके पास था तथा उसकी पत्नी की गोंद में छोटा बच्चा था। बैग के चक्कर में राहुल पूरे फेमिली के साथ चढ़ नहीं पाया था।
राहुल का रिजर्वेशन में जो चार हजार रूपये लगाये थे वह अब उसकी वजह से पानी में चला गया था। एक दूसरी ट्रेन पकड़कर वह किसी तरह बहुत ही कठिनाई, बहुत ही तकलीफ से अपने ड्यूटी के स्थल पर आया था। कठिनाई इस कारण भी हुई कि बिना रिजर्वेशन के रेलगाड़ी के ए सी डब्बे में चढना कितना मुश्किल काम है वह वही समझ रहा था।  राहुल अपनी माँ पर बहुल गुस्सा हो रहा था हद से ज्यादा प्यार की वजह से उसकी ट्रेन छूट गयी थी जिससे की उससे हजारों रूपयों का नुकसान हुआ था वह भी बहुत ही तुच्छ सामान जैसे कि दालें, चावल, देसी घी, अचार, तेल के लिए। एक बार तो फोन पर माँ को डाटा भी था कि माँ अब ज्याद ओवर एक्टिग न करों रखो यह सारा सामान वहाँ पर मिल जाता है आज इसकी वजह से ट्रेन में नहीं चढ़ पाया जिसकी वजह से मेरा हजारों रूपये नुकसान हो गया।
कुछ दिनों बाद ही राहुल की माँ अब न रही । अब राहुल जब भी घर आता  और लौटने लगता तो सामानो से भरा बैग अब कोई देने वाला न रहा। राहुल को अचार, पापड़, अरहर की दाले बहुल ही पसंद थी। शहरों में लाख खोजने पर भी ये चीजें दुर्लभ न  मिलती  थी। माँ के बने हाथों के तो क्या कहने स्वाद लाजबाब होता था।
बहुत दिनों बाद वह अनुभव कर पाया था कि माँ दालें, चावल, देसी घी, अचार, पापड़, तेल या सामान ही नहीं देती थी वह तो अपना प्यार देती थी वह अब देने वाला कोई न रहा। वह आज घर से लौट रहा था और उसकी आँखें ढबढबा गयी थी। कुछ बूँदे आँसू के उसके चेहरे पर ढुलक गये थे उस बार जो ट्रेन छूट गयी थी उसका गम भी उसे न रहा प्यार के आगे वह आज नतमस्तक हो गया था।
दिनांकः 16.07.2018, सिलीगुड़ी, गिरधारी राम.

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