पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था पर आज हम एकल परिवार में विश्वास रखते है। ग्रामीण अंचल में तो कुछ ठीक है पर शहरी अंचल में हम कुछ इस कदर एकांकीपन हो गये है कि हमारे फ्लैट के सामने कौन रहता है हमें पता तक नहीं होता है। दरअसल हम नहीं चाह रहे है कि हमारे निजी जिंदगी में किसी गैर की दखलअंदाजी हो। यह तो ठीक है कि निजी जिंदगी में किसी को भी दखलअंदाजी पसंद नहीं होता है पर हमे मानवता के नाते अपने आस-पास तो नजर रखनी ही पड़ेगी। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और बिना समाज के मनुष्य को कोई अस्तित्व नहीं होता। हर मनुष्य का सुख-दुख समाज के हर वर्ग के लोग बाँटते है तभी मनुष्य जिंदा रहता है अगर मनुष्य के अंदर से समाज शब्द का विलोपन हो जाय तो शायद मानव जाति ही खतरे में पड़ जायेगी।
अभी कल ही की तो बात है। मैं एक सहकर्मी के शवयात्रा में शामिल हुआ था। शवयात्रा में सौकड़ो लोग शामिल थे। जब लोग अंतिम संस्कार करने के लिए शमशान घाट पहुँचे तो लोगो का हुजुम कम नहीं हुआ। शमशान घाट पर सैकड़ो लोग इकट्ठा देख सहकर्मी के परिवार को बहुत संवेदना मिल रही थी। इस विपत्ति में इतने लोगो का साथ देखकर उनके मन में ढाढ़स था।
कुछ समय के उपरांत एक बूढ़ी महिला का शव लिए शवगाड़ी से एक आदमी अपनी एक बहन तथा अपनी पत्नी के साथ शमशान पहुँचा। शमशान में वह आदमी विनती करने लगा कि भईया शव को थोड़ा कंधा दे दिजिए। हमारे सहकर्मी के अंतिम यात्रा में शामिल लोग उसकी मदद किये।
बाद में पता चला कि ये शहरी पता चला कि ये शहरी फ्लैट कल्चर(संस्कृति) की उपजी हुई समस्या का परिणाम है। जहाँ अपने फ्लैट के सामने कौन रहता है हम उसको जानते तक नहीं और मुसिबत में शव को कंधा देने वाले भी नहीं मिलते।
गिरधारी राम, दिनांकः17.11.2017
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