शनिवार, 8 सितंबर 2018

दुर्गा

यह कहानी एक पगली की है जिसका नाम था दुर्गा। ऐसा नहीं है कि पगली जन्म से ही मंद वुद्धि की थी पहले वह अच्छी थी। जब दुर्गा  छोटी थी यानी यही कोई चार या पांच साल की रही होगी, स्कूल में जाना शुरू किया था। स्कूल में टीचर्स भी उसके प्रभाव से वंचित नहीं रह सके। कविता, छोटी कहानी, पहाड़ा तथा कोर्स की किताबें तो जैसे उसे मुंह जबानी याद है।
कुछ दिनों पहले की बात है एक दिन दुर्गा  स्कूल से घर आ रही थी तभी से गायब हो गई थी। घर वाले खोजने की बहुत कोशिश की पर खोज न पाए।
काफी दिनों बाद दुर्गा मिली पर वह मानसिक विक्षिप्त हो गई थी। वह घरवालों को भी नहीं पहचानती भी नहीं थी। दुर्गा घर पर नहीं रहती। आज कल वह स्टेशन के आसपास ही रहती थी।
दुर्गा के अंदर एक बदलाव आया था। वह आजकल  दुर्गा(देवी माँ) का रूप धारण करती थी। रूप-श्रृंगार करती माथे पर मुकुट लगाती तथा हाथ में त्रिशूल लेकर पूरे स्टेशन पर घूमती रहती।यह उसकी हर रोज की दिनचर्या थी।
मैं बहुत दिनों बाद उसकी मनोदशा समझ पाया था। दरअसल दुर्गा हर रोज महिसासुर को खोजती थी दुर्गा बनकर, जिससे वह बदला ले सके।
दिनांकः03.10.2017,सिलिगुड़ी,गिरधारी राम

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें