शुक्रवार, 29 मार्च 2019

हमारा कल

रिया, रोहन को हमेशा डॉटती रहती थी. वह बोला करती थी, तुम क्यों बेकार का क्यो अपना टाईम बर्बाद कर रहे हो. दरअसल रोहन एक सामाजिक संगठन "मुक्ति"से जुड़ा हुआ था जो कि अपने परिवार से बिछड़े बच्चों की मदद किया करता था. बहुत सारे बच्चों को इस संगठन की मदद से अपने परिवार से मिलाया था. भिक्षावृत्ति, नशा, यौन शोषण  तथा मानव तस्करी के शिकार बच्चों को इन बुराई से निजात दिलाने में मदद की थी. रोहन सोचा करता था कि हम जो काम कर रहे हैं वह अपने लिए, अपने समाज और अपने देश के लिए कर रहे हैं. यहीं बच्चें तो "हमारा कल" है. रोहन अपनी परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए बहुत दिनों बाद रिया को समझाने मे सफल हो पाया था. अब रिया समझ चुकी थी ये बच्चे अपने बच्चों की तरह ही अपने है, और ये भी हमारा कल है. अब रिया को रोहन पर गर्व हो रहा था.

शनिवार, 8 सितंबर 2018

मुदित हुई

   
बात उन दिनो की है जब मेरी नई-नई शादी हुई थी। शादी के दो-तीन दिनो के बाद सब मेहमान घर से चले गये। घऱ पर कुछ लोग ही रह गये थे।
सासू माँ ने कहाः- बहु जाओ बेटे को खाना दे आओ। मैं जब खाना देने गये तो वो पहले से ही आसन पर बैठे थे। मैं सर पर पल्लू डाले ही खाना देकर उनके सामने बैठ गयी। और बोली खाईये जी! तब वह बोले तुम भी मेरे साथ खाओ। मैं बोली आप खा लिजिए मैं बाद में खा लूगी। और वो खाना खाने लगे। और मैं बैठे-बैठे उनका मुँह निहार रही थी।
कुछ देर के बाद वह बोलेः- आपके घर मे कौन-कौन है? मैंने घर के सभी लोगो का परिचय बताया। फिर बोले आपके घर मे कुत्ता है, कि नही?
मैने बोलीः- कुत्ता तो नही लेकिन, कुतिया है घर में।
फिर वह बोले जब आप खाना खाती हो तो कुतिया क्या करती है?
मैं बहुत भोलेपन से बोली। वह हमारा मुँह देखती है।
कुछ देर बाद वह शान्त हो गये। मैं अभी भी उनका मुँह निहार रही थी।
फिर दुवारा बोलेः- कुतिया क्या करती है, मैं फिर बोली कुतिया मेरा मुँह ही देखती है।
अचानक मेरा ध्यान भंग हुआ। “कुतिया मेरा मुँह देखती है” उस पर मेरा ध्यान गया। मैं तो अभि भी उन्ही को निहार रही थी। मैं शर्मिंदा होकर अपना मुँह अपने हाथो से छुपा लिया। मुझे काफी लज्जा आयी। फिर वो मेरी ओर देखकर हँसने लगे, अब मुझे भी हँसी आ गयी।
दरअसल वह चाह रहे थे कि खाना एक साथ खाया जाय, एक ही थाली मे। लेकिन मैं नई नवेली दुल्हन मन मे काफी लज्जा संकोच था, इसीलिए मना कर दी कि, आप खाईये मैं बाद मे खा लुंगी।
आज मेरे दो बच्चे है।लेकिन जब भी वो बात याद आती है तो मुँख पर मुस्कान स्वतः ही तैर जाती है।                       
                              समाप्त                  21.07.2010 सिलीगुड़ी

कालाधन

मैं उस गरीब से पूछा जो खेत में काम कर रहा था क्यों भैयाः मोदीजी तो आपके पेट पर लात मार दिया न! आपकी मजदूरी पिछले दस दिनों से नहीं मिल रही है, आपके घर में काला धन मिला क्या? मोदीजी बेवजह शक कर रहे है गरीब पर, फिर भी आप कुछ नहीं बोल रहे है क्या बात हैं?
वह खेत में काम करने वाला मजदूर बोलाः मोदीजी का नोटबंदी, काला धन तथा आतंकवाद में रूपये का इस्तेमाल भले न ज्यादा रोक पाए पर क्या ये कम है कि हर आदमी आज इस बुराई को मिटाने के लिए एकजुट हो गया है। हर एक शख़्स के अदर देश प्रेम की भावना जगी है। मेरी आँखे खुली की खुली रह गयी मैं अवाक् होकर उसका मुँह देख रहा था।
दिनांकः 23.11.16 सिलीगुड़ी
गिरधारी राम

वोट

पिछले चुनाव की बात है झुनिया ने साड़ी ग्राम प्रधान के सामने ही फेक दिया था। ग्राम प्रधान ने वोट के बदले में साड़ी देने का प्रयास किया था। फिर दोवारा किसी की भी हिम्मत न हुई कि झुनिया को मना ले।
वोट की गिनती में एक बार फिर वर्तमान ग्राम प्रधान की जीत हुई। चुनाव खत्म हो गया। चुनाव में साड़ी न लेने का परिणाम झुनिया को भुगतना पड़ा। उसका आज तक लाल राशन कार्ड नहीं बना। लाल राशन कार्ड की सूची में ग्राम प्रधान के छोटे भाई का भी नाम था जो कि काफी समृद्ध था पर झुनिया का नही बन पाया जो कि सचमुच इसकी हकदार थी।
जिला पंचायत के चुनाव नजदीक आ रहे थे। रात का समय था करीब बीस पच्चीस की संख्या में झुनिया के दरवाजे पर लोग पहुँच गये। दो हजार रूपये जिसमें पाँच पाँच सौ के चार नोट झुनिया के हाथ में पकड़ाकर प्रत्यासी नें पैर छूकर प्रणाम किया। झुनिया इस बार कुछ न बोली। वह इस बार भी रूपये को फेकना चाह रही थी पर एक अनजाना डर के मारे कुछ कर न सकी। वोट के बदले उपहार न लेने का परिणाम पहले ही भुगत चुकी थी।
जब सुबह वोट देकर आयी तो कुंठाग्रसित मन में पाप का बोझ लिए संदूकची खोली। वह गौर से देख रही थी। बस एक ही नोट असली है बाकी तीन पाँच सौ के नोट नकली है। झुनिया इस बार ठगी जा चुकी थी।
झुनिया एक गरीब विधवा थी। पति के मरे पाँच साल गुजर गये थे। एक औलाद भी हुआ तो किसी काम का न था। गरीब माँ को छोड़कर जो दिल्ली गया तो वह कभी गाँव का रूख न किया। अब तो उसका कोई सहारा न था। दूसरो के खेतों में मजदूरी करके झुनिया गुजारा करती।
चुनाव आयोग के लाख प्रयास के वावजूद वोट अपनी सही जगह पर नहीं जा रहा था। कुछ बुरे स्वभाव के लोग डरा धमकाकर अपनी रोटी सेंक रहे थे।
विधायक के चुनाव थे। इस बार भी काफी लोगो ने प्रयास किया कि झुनिया को रिझाने के लिए। झुनिया ने एक तरकीब सोची। वह सभी से कहती भैया! मैं वोट आपको ही दूँगी पर आपसे कुछ न लूँगी। लोग पूछतेः आखिर क्या गारंटी है कि तू हमें ही वोट दोगी? वह कहती तू आकर देख लेना मैं किसको वोट देती हूँ।
चुनाव आयोग की सख्ती थी। कोई भी वोट के दलाल पोलिंग बूथ पर गलत नहीं कर पा रहा थे। झुनिया नें मौका देखकर अपना वोट अपनी पसंद के उम्मीदवार को दे दी। झुनिया के मन में एक अलग तरह शांति थी। ।
परिणाम आ गया। झुनिया के पसंद का उम्मीदवार ही इस विधायक चुनाव में जीता था। उसने पहली बार अपनी वोट की ताकत को पहचानी थी। झुनिया को इस बार संतोष था। झुनिया सोच रही थी कि यदि इसी तरह चुनाव होते रहे तब ही इमानदार प्रत्यासी आपके वोट के द्वारा चुन कर आयेगा। सरकार के सभी योजनाओं का लाभ एक दूर गाँव में आम आदमी तक पहुँच पायेगा तभी सचमुच देश का विकाश होगा। 
दिनांकः 17-2-2017

सीख

मैं जिस डिब्बे में चढ़ा था उसमे मात्र दो चार ही सहयात्री थे। मैं जिस सीट पर बैठा था उसके सामने की सीट पर कोई यात्री नहीं बैठा था। मैं अपना पैर जूते सहित आगे की सीट पर  फैलाकर बैठ गया। जूते में किचड़ ते नहीं परंतु धूल मिट्टी तो जरूर लगा हुआ था। मैं इस ख्याल से विमुख था कि मैं जिस सीट पर जूते वाला पैर रखा हूँ उस पर हमारे जैसा कोई  इंसान ही बैठेगा और मैं एक पत्रिका पढ़ने में मशगूल हो गया।
पैसेंजर ट्रेन थी जो हर स्टेशन पर रूकती जा रही थी। ट्रेन अगले स्टेशन पर रूकी। एक यात्री मेरे डिब्बा में चढा और हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। मैं अपना पैर सीट से नीचे उतार लिया। हमारा दिल में आया कि आगे की सीट को साफ कर दूँ जिस पर आगंतुक आकर बैठ सके। मेरा मन अभी सोच ही रहा था कि तब तक आगंतुक नें अपने बैग से न्यूज पेपर निकाला और पैर रखी हुई जगह को साफ किया और सीट पर बैठ गया उसके मन में शिकायत का लेशमात्र नामों निशाँ नहीं था। वह जो न्यूज पेपर उसके हाथ में था उसे पढ़ने लगा।
मेरा मन आत्मग्लानी से भर उठा। मैं उस व्यक्ति की महानता पर भावविभोर था और मन ही मन यह सोच रहा था, दोहरा रहा था कि आइंदा ऐसा कोई भी काम नहीं करूँगा जिसे जिससे दूसरों का अहित हो दूसरे के लिए परेशानी का शबब बने, मेरी फैलाई हुई गंदगी कोई दूसरा साफ करे। वह व्यक्ति मेरे द्वारा फैलाई गंदगी साफ करके एक महानता का परिचय दिया था।
ट्रेन अगले स्टेशन पर रूकी। वह आगंतुक जो कि मेरे सामने बैठा था स्टेशन पर उतर गया। मैं अपने डिब्बे में दो-चार सहयात्रियों के साथ था परंतु मेरे सामने की सीट फिर से खाली हो गयी। गाड़ी फिर से रफ्तार पकड़ी और एक बार फिर मैं अपनी पत्रिका पढ़ने में मशगूल हो गया। कुछ देर अभी बीते ही होंगे कि मैं अपनी बुरी आदतन की बदौलत अपना जूतों वाला पैर एक बार फिर मेरे सामने की सीट पर फैला दिया। मैं जब पत्रिका का अंतिम पैरा खत्म करने वाला ही था कि अचानक मेरा ध्यान अपने पैर की तरफ गया। यद्यपि कि वहाँ कोई सामने नहीं बैठ था फिर भी मैं अपनी गलती को स्वीकार किया और अपनी गलती पर पछता रहा। मैने अपना जूता निकाला तथा मोजे भी उतार दिये और नंगा पैर आगे की सीट पर फैलाकर अति प्रसन्न हो रहा था। मुझें बहुत ही अच्छा लग रहा था।
ट्रेन अगले स्टेशन पर रूकी। एक यात्री फिर हमारे सामने की सीट के पास आकर खड़ा हो गया। मेरे पैर अपनेआप नीचे आ गये। वह नया आगंतुक बड़े ही आराम से बैठ गया और अपना गंदा जूतों वाला पैर मेरे सीट पर मेरे बगल में फैलाकर वह भी कोई पत्रिका पढ़ने में तल्लीन हो गया।
मेरा मन ग्लानि से भर गया, मेरे हृदय में बहुत ही तकलीफ हुई, उसके पैर की गंदगी देखकर परंतु उस व्यक्ति को समझा नहीं सकता था क्योंकि मैं भी वही गलती कुछ देर पहले ही कर चुका था। लेकिन मेरे कानों में एक बात गूँज रहा था कि “जब तक आदमी को ठोकर नहीं लगती तब तक उसे “सीख” नही मिलती”। मैं उस व्यक्ति के जूते वाला पैर देखे ही जा रहा था कि “कितनी जूतों में गंदगी लगी है”।
दिनांकः25.07.2005, सिलीगुड़ी, गिरधारी राम

   

कंधा

कुछ दिन पहले की बात है मेरे सहकर्मी का स्वर्गवास हो गया था। मैं उनके अंतिम यात्रा में शामिल था। जब हम लोगो ने शव को शमशान घाट लेकर पहँचे तो शाम के करीब पाँच बजे थे। वहाँ का नजारा बहुत ही अद्भुत था। शमशान घाट पर शवो की लाईन लगी है। बिजली से चलने वाले शवदाह गृह में एक शव को शवदाह करने में लगभग एक घंटा लग रहा था। मेरे सहकर्मी का शव बारह नम्बर पर  था।
शमशान घाट का नजारा बहुत ही चहल-पहल वाला था। जो भी लोग शवों को लेकर आते थे तो राम-राम सत्य है, सबकी यही गत है बोलते आते या कुछ लोग बोलते कि गंगाजी दूर है जाना जरूर है। कुछ शव तो बंगालियो के थे वह शायद राम को नहीं वह तो कृष्ण को मानने वाले थे। वह शव को लेकर आते तो आवाज लगाते- बोल हरि-बोल हरि।
शमशान घाट पर इंतजार करते-करते रात के करीब तीन बज गये। मेरे कुछ साथी शमशान पर बने दुकानों में चाय पी रहे थे। कुछ समय के बाद घाट पर एक और शव एक गाड़ी से आ गयी। उस गाड़ी में से दो महिलाएँ उतरी। वह पास में खड़े लोगो से निवेदन कर रही थी कि आप थोड़ा कंधा दे देगें क्या? घाट पर उपस्थित लोग बड़े ही सम्मान से शव को कंधा देकर शवदाह गृह के पास ले आये। वहाँ पर शव को अंतिम क्रिया करने के लिए शव को गाय का धी लेपन करना पड़ता था तथा गंगा का पानी से स्नान कराना पड़ता था। यह सब क्रिया मेरे मित्र सब कर दिये।
कुछ देर बाद  मेरे सहकर्मी का शव का शवदाह किया गया। शमशान से आते-आते शुबह हो गयी। मैं जब घर पहुँचा तो बस एक ही बात समझ में आ रही थी कि मनुष्य पूरी ही जिंदगी बस यही प्रयास में रहता है कि आलीशान घर बना लू, मँहगी गाड़ी खरीद लू, जमीन खरीद लू, रूपये जमा कर लू पर मरने के बाद कुछ नहीं ले जा पाता है। वह तो खाली हाथ आता है और जिंदगी भर भौतिक चीजो की पकड़ने की कोशिश करता है पर जब वह मर जाता है सब कुछ यही रह जाता है मुट्ठी खुली रह जाती है ताकि लोग देख सके कि देखो मरने के बाद मनुष्य कुछ भी लेकर उपर नहीं जाता। वह केवल लेकर जाता है तो केवल व्यवहार। अपने किये हुए कर्म। दूसरो के लिए दिये गये योगदान।
मेरे मित्र की शमशान यात्रा में सैकड़ों लोग गये थे पर हाय रे किस्मत कि कुछ लोग को उठाने के लिए चार कंधे भी नहीं मिलते है। वह मनुष्य आखिर क्या कर्म किया कि उसको उठाने के लिए कंधे तक न मिले।
ये सब आधुनिक संस्कृति की देन है। बहु मंजिला इमारत रह रहे लोग अपने सामने का पड़ोसी कौन है शायद उसे हम पहचानते तक नहीं, न ही जान पहचान बनाने की कोशिश भी करते है, सोचते है कि कहीं बात-बात में हमारी नीजी जिंदगी में दखल दे बार-बार जो उसे पसंद नहीं है। तो आप सोच सकते है कि जब वह मर जायेगा तो उसे कंधा कौन देगा।  
पर बोला जाता है न कि जिसका कोई नहीं उसका खुदा है यारों और यह सत्य भी है। जब तक मनुष्य में मनुष्यता थोड़ी बहुत बची रहेगी तो हम अपने शवों को सम्मान दे पाएँगे।
आप हमेशा ऐसा कर्म करे कि लोग आपके अंतिम यात्रा में आपके कंधा माँगने की जरूरत न हो लोग खुद-ब-खुद कंधा देने आये। वही आपकी  पूरी जिंदगी की असली कमाई है। भौतिक चिजे तो वक्त के साथ मिट जाएगी पर आपके किए गये इस धरती पर अच्छे काम को लोग युग-युग तक  याद करेंगे।
गिरधारी राम, दिनांकः 08.11.2017, सिलीगुड़ी

एकांकीपन

पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था पर आज हम एकल परिवार में विश्वास रखते है। ग्रामीण अंचल में तो कुछ ठीक है पर शहरी अंचल में हम कुछ इस कदर एकांकीपन हो गये है कि हमारे फ्लैट के सामने कौन रहता है हमें पता तक नहीं होता है। दरअसल हम नहीं चाह रहे है कि हमारे निजी जिंदगी में किसी गैर की दखलअंदाजी हो। यह तो ठीक है कि निजी जिंदगी में किसी को भी दखलअंदाजी पसंद नहीं होता है पर हमे मानवता के नाते अपने आस-पास तो नजर रखनी ही पड़ेगी। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और बिना समाज के मनुष्य को कोई अस्तित्व नहीं होता। हर मनुष्य का सुख-दुख समाज के हर वर्ग के लोग बाँटते है तभी मनुष्य जिंदा रहता है अगर मनुष्य के अंदर से समाज शब्द का विलोपन हो जाय तो शायद मानव जाति ही खतरे में पड़ जायेगी।
अभी कल ही की तो बात है। मैं एक सहकर्मी के शवयात्रा में शामिल हुआ था। शवयात्रा में सौकड़ो लोग शामिल थे। जब लोग अंतिम संस्कार करने के लिए शमशान घाट पहुँचे तो लोगो का हुजुम कम नहीं हुआ। शमशान घाट पर सैकड़ो लोग इकट्ठा देख सहकर्मी के परिवार को बहुत संवेदना मिल रही थी। इस विपत्ति में इतने लोगो का साथ देखकर उनके मन में ढाढ़स था।
कुछ समय के उपरांत एक बूढ़ी महिला का शव लिए शवगाड़ी से एक आदमी अपनी एक बहन तथा अपनी पत्नी के साथ शमशान पहुँचा। शमशान में वह आदमी विनती करने लगा कि भईया शव को थोड़ा कंधा दे दिजिए। हमारे सहकर्मी के अंतिम यात्रा में शामिल लोग उसकी मदद किये।
बाद में पता चला कि ये शहरी पता चला कि ये शहरी फ्लैट कल्चर(संस्कृति) की उपजी हुई समस्या का परिणाम है। जहाँ अपने फ्लैट के सामने कौन रहता है हम उसको जानते तक नहीं और मुसिबत में शव को कंधा देने वाले भी नहीं मिलते।
गिरधारी राम, दिनांकः17.11.2017