मैं जिस डिब्बे में चढ़ा था उसमे मात्र दो चार ही सहयात्री थे। मैं जिस सीट पर बैठा था उसके सामने की सीट पर कोई यात्री नहीं बैठा था। मैं अपना पैर जूते सहित आगे की सीट पर फैलाकर बैठ गया। जूते में किचड़ ते नहीं परंतु धूल मिट्टी तो जरूर लगा हुआ था। मैं इस ख्याल से विमुख था कि मैं जिस सीट पर जूते वाला पैर रखा हूँ उस पर हमारे जैसा कोई इंसान ही बैठेगा और मैं एक पत्रिका पढ़ने में मशगूल हो गया।
पैसेंजर ट्रेन थी जो हर स्टेशन पर रूकती जा रही थी। ट्रेन अगले स्टेशन पर रूकी। एक यात्री मेरे डिब्बा में चढा और हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। मैं अपना पैर सीट से नीचे उतार लिया। हमारा दिल में आया कि आगे की सीट को साफ कर दूँ जिस पर आगंतुक आकर बैठ सके। मेरा मन अभी सोच ही रहा था कि तब तक आगंतुक नें अपने बैग से न्यूज पेपर निकाला और पैर रखी हुई जगह को साफ किया और सीट पर बैठ गया उसके मन में शिकायत का लेशमात्र नामों निशाँ नहीं था। वह जो न्यूज पेपर उसके हाथ में था उसे पढ़ने लगा।
मेरा मन आत्मग्लानी से भर उठा। मैं उस व्यक्ति की महानता पर भावविभोर था और मन ही मन यह सोच रहा था, दोहरा रहा था कि आइंदा ऐसा कोई भी काम नहीं करूँगा जिसे जिससे दूसरों का अहित हो दूसरे के लिए परेशानी का शबब बने, मेरी फैलाई हुई गंदगी कोई दूसरा साफ करे। वह व्यक्ति मेरे द्वारा फैलाई गंदगी साफ करके एक महानता का परिचय दिया था।
ट्रेन अगले स्टेशन पर रूकी। वह आगंतुक जो कि मेरे सामने बैठा था स्टेशन पर उतर गया। मैं अपने डिब्बे में दो-चार सहयात्रियों के साथ था परंतु मेरे सामने की सीट फिर से खाली हो गयी। गाड़ी फिर से रफ्तार पकड़ी और एक बार फिर मैं अपनी पत्रिका पढ़ने में मशगूल हो गया। कुछ देर अभी बीते ही होंगे कि मैं अपनी बुरी आदतन की बदौलत अपना जूतों वाला पैर एक बार फिर मेरे सामने की सीट पर फैला दिया। मैं जब पत्रिका का अंतिम पैरा खत्म करने वाला ही था कि अचानक मेरा ध्यान अपने पैर की तरफ गया। यद्यपि कि वहाँ कोई सामने नहीं बैठ था फिर भी मैं अपनी गलती को स्वीकार किया और अपनी गलती पर पछता रहा। मैने अपना जूता निकाला तथा मोजे भी उतार दिये और नंगा पैर आगे की सीट पर फैलाकर अति प्रसन्न हो रहा था। मुझें बहुत ही अच्छा लग रहा था।
ट्रेन अगले स्टेशन पर रूकी। एक यात्री फिर हमारे सामने की सीट के पास आकर खड़ा हो गया। मेरे पैर अपनेआप नीचे आ गये। वह नया आगंतुक बड़े ही आराम से बैठ गया और अपना गंदा जूतों वाला पैर मेरे सीट पर मेरे बगल में फैलाकर वह भी कोई पत्रिका पढ़ने में तल्लीन हो गया।
मेरा मन ग्लानि से भर गया, मेरे हृदय में बहुत ही तकलीफ हुई, उसके पैर की गंदगी देखकर परंतु उस व्यक्ति को समझा नहीं सकता था क्योंकि मैं भी वही गलती कुछ देर पहले ही कर चुका था। लेकिन मेरे कानों में एक बात गूँज रहा था कि “जब तक आदमी को ठोकर नहीं लगती तब तक उसे “सीख” नही मिलती”। मैं उस व्यक्ति के जूते वाला पैर देखे ही जा रहा था कि “कितनी जूतों में गंदगी लगी है”।
दिनांकः25.07.2005, सिलीगुड़ी, गिरधारी राम
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