गुरुवार, 30 अगस्त 2018

दादी

उस समय मेरी उम्र ज्यादा न थी। करीब सात या आठ साल की रही होगी। हम अपने गाँव में पूरे परिवार के साथ रहा करते थे। घर में मम्मी-पापा,चाचा-चाची,छोटी वुआ और दादीजी भी थी। दादाजी का काफी दिन पहले ही देहान्त हो गया था मैं उनको देख नहीं पाया था क्योंकि वह मेरे पैदा होने से पहले ही गुजर गये थे।
सुबह होनें के पहले ही मेरी दादी जग जाया करती थी। वैसे तो रात-रात भर जग कर पूछा करती थी कि  कितना बजा है!  कितना बजा है!  पर लगभग चार बजे के आस-पास पूर्ण रूप से जग जाती। जागते ही वह आवाज लगाया करती। मेरा नाम लेकर ग्रामीण तरीके से पुकारा करती थी। अरे... कहा....वाड़े रे....सुनीलवा.... जगले की ना रे.......। 
दरअसल जगाने का कारण भी था। मैं हर रोज दादीजी की हुक्क़े की चीलम पर आग रखा करता था। आग घर के कोने में रात भर जलती रहती थी। चीलम में गोल मिट्टी को छोटा ढेला रखता,  फिर उपर से तम्बाकू को नरम और भुरभरा करके उसके उपर रखता, इसके बाद में गोबर के उपले की दहकती हुई आग के अंगारों को रखा करता था। अगर उपला पूरी तरह से नहीं जला हो और धुँआ आ रहा हो तो चीलम का मजा पूरी तरह से खराब हो जाता था ऐसा मेरी दादी बोला करती थी।
जब हुक्क़ा को तैयार करके देता था तो दादीजी ही बोला करतीः- थोड़ा इसको जगाओ( इसका मतलब कि पीने लायक तैयार करो)। मैं उस हुक्क़ा की पीने वाली नली पगड़कर खेल खेल में खींच लेता था। कभी सफेद धुँवा मेरे नाक में समा जाता था जिससे मैं खाँसने लगता था। एक बार तो मैं हुक्क़े को जोर से खींच लिया जिससे कि हुक्क़े का पानी मेरे मुँह में आ गया और मेरे मुँह तीख़ा हो गया था ।
जब दादी हुक्क़ा को पीती तो हुक्क़े से गड़गड़ की आवाज आती। उनके दोनो गाल काफी अंदर की ओर धँस जाता था। मैं दादी के पोंपले मुँह को निहारा करता था। झुर्रीदार, खुरदरा और उस पर गोदना से पूरा चेहरा ही भरा हुआ था। माथे पर,गाल पर, ललाट पर, ठुड्डी पर, बाँह पर, बाजू पर, पैर के निचले हिस्से भाग पर यानी कि पूरे शरीर का लगभग आधा भाग गोदना से भरा हुआ था। गोदना जिसे अंग्रेजी में टैटू भी कहते है।
अपने यौवन काल में मेरी दादी बहुत ही सुंदर रही होंगी। उनकी कोई फोटो आज मौजूद नहीं है पर मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि उनको उस जमाने का फैसन बहुत भाता होगा। उनकी उस झुर्रीदार चेहरे से ही पता चलता था। उसके दोनो कान चाँदी के झुमके की वजन से फट चुके थे।
मेरे दादाजी उस समय  कलकत्ता में रहा करते थे। कलकत्ता से साबुन, नारियल तेल, ठंड़ा तेल, कपड़े तथा बचत के रूपये लेकर आया करते थे। दादीजी को और चाहिए क्या? उनके लिए ठंड़ा तेल ही बहुत कुछ था।
ये तो जमाना था आज से तीस-चालीस साल पहले का है। आज वही सुनिलवा यानी सुनील कुमार पैंतीस साल को हो गया है।   आज मै(सुनील कुमार)  जब मैं किसी मॉल में जाता हूँ और ये टैटू की दुकान और हुक्क़ा बार को देखता हूँ तो मेरी दादीजी की याद बरबस आ जाती है। मैं सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि अभी ये जमाना बेहतर है न कि वो जमाना जो दादी का हुआ करता था। जिसमें हुक्क़ा बार घर-घर हुआ करता था। टैटू बनाने वाली औरते घर पर ही आ जाया करती थी। यह हुक्क़ा समाज को कितना मजबूती से जोडे हुए था। जिसमें लोग बार-बार हुक्क़ा पानी बंद करने की धमकी दिया करते थे। वही सभ्यताएँ एक बार फिर इस नये जमाने में दस्कत दे रही है।जिसमे इसको पाना आधुनिकता की निशानी मानी जा रही है।मेरी दादीजी के जमाना शायद आधुनिक  रहा होगा और आज हमारा समाज विकृति मानसिकता लिये इसको पाने के लिए प्रयास कर रही है। दिनांकः13.01.2018,सिलीगुड़ी

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