बुधवार, 29 अगस्त 2018

स्वाभिमान

मैं रोज सुबह सब्जी मंडी पहुँच जाता था सब्जी खरीदने के लिए। सुबह जाने कारण यह था कि सुबह में सब्जियां ताजी मिलती थी।मंडी में अधिकतर बिक्रेता दूर ग्रामीण क्षेत्रों से आते थे। मेरी निगाह जब भी उस बिक्रेता पर पडता तो मेरा हाथ श्रद्धा से उठ जाता और प्रणाम करता।
इसका भी एक कारण था। वह बिक्रेता जिसका नाम दुलाल था,वह पोलियो का शिकार था पर उसका स्वाभिमान गजब का था। वह रोज चालिस किलोमीटर की दूरी से सब्जियों को ट्रेन से लेकर आता और मंडी में सब्जियों को बेचकर रोज अपने घर चला जाता।
उसका एक हाथ बिल्कुल ही खराब था तथा एक पैर भी टेढ़ा था इतना के बाद भी वह तीस-चालिस किलो के सब्जियों के गट्ठर को लेकर लगभग दौडते हुए चलता था। सब्जी मंडी में बहुत ही कम कीमत पर सब्जियों को बेचता था।मुझे लगता था कि वह ग्राहक को उचित दाम पर सब्जियों को देना चाहता था किसी का गला नहीं काटना चाहता था।
वह अपनी कमजोरियों को कभी भी अपने स्वाभिमान के आगे नहीं आने दिया। दुलाल कभी भी किसी की दया पर निर्भर नहीं रहना चाहता था। उसका हाथ उसके पाकेट तक पहुँचने में परेशानी होती थी इसलिए वह अपना पाकेट का साईज बढ़ा लिया था।
आज मैं जब भी हट्टे-कट्टे लोगों को भीख मांगते देखता हूँ तो बरबस दुलाल की याद आ जाती है। उसके स्वाभिमान को नमन् करता हूँ।
दिनांकः 21.02.2018 गिरधारी राम
सिलीगुड़ी।

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