मैं जब पैदा हुई तो मेरी दादी न जाने क्यों मेरी माँ को बड़ी अजीब नज़रों से देख रही थी। वह नहीं चाहती थी कि मैं उनके घर में आऊँ, पर इसमें उनका बस नहीं चला, न चाहते हुए भी अनमना ढंग से अपनी गोंद में मुझें लेना पड़ा। वह सोच रही थी कि लड़का होगा तो धूम-धाम से खुशियाँ मनाई जायेगी, पर मेरे पैदा होते ही सारी खुशी गम में बदल गयी थी।
धीरे-धीरे मैं बड़ी होने लगी। मैं अधिकतर दादी के पास ही रहती। उन्हीं के पास सोती, जागती और उन्हीं पास खेलती। इसी तहर काफी दिन बीत गये, इतने दिन बीत जाने के बाद भी मेरी दादी के पत्थर दिल पर दूब नहीं जम पायी थी।
मुझें अच्छी तरह याद है मैं कक्षा सात पढ़ रही थी। बरसात का दिन था, दादी कुछ काम से घर के बाहर पड़ोस में गयी हुई थी। उसी समय बारिस जोरो से होने लगी। दादी सोची कि घर के आँगन में कपड़े डाले है, घर में बहु कहीं सो रही हो तो पूरा कपड़ा भींग जायेगे इसी धुन में वह तेजी से कदम घर की ओर बढ़ाने लगी। जमीन पानी से भींगा हुआ था। अचानक उनका पैर फिसल गया। वह वहीं पर धड़ाम से गिर पड़ी। घर आते ही उनका पैर काफी सूज गया। एक्सरे करने पर पता चला कि उनका पैर की हड्डी मे फ्रैक्चर है।
पूरा तीन महीने लग गये दादी को पूरी तरह से ठीक होने में। मैं दादी के हर वक्त साथ रहती। मैं उनको खाना-पानी देती उनकी पूरी सेवा करती। । दादी के पैर टूटने के बाद वह बहुत बेवस नजर आती थी। हर चीज के लिए मेरे उपर निर्भर रहती थी।
पहले तो मैं दादी को समझ नहीं पाती थी कि दादी मुझें प्यार करती है या नहीं। पर वह घटना नें दादी को पूरी तरह बदल दिया था। मुझें इसका पता तब चला जब मेरी शादी हुई। जब मेरी विदाई हो रही थी तब दादी खूब फूट-फूट कर रो रही थी। बार-बार यही बोल रही थी कि अनु तुम्हारे चले जाने के बाद मैं सचमुच अकेली हो जाऊगी। अब मेरे पैदा होने का उनके मन में अफसोस नहीं रह गया था। शायद उनके पत्थर दिल पर दूब का अंकुरण हो गया था।
दिनांकः21.01.2018, गिरधारी राम, सिलीगुड़ी
बुधवार, 29 अगस्त 2018
धूल छँट गयी
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