कुछ दिन पहले की बात है मेरे सहकर्मी का स्वर्गवास हो गया था। मैं उनके अंतिम यात्रा में शामिल था। जब हम लोगो ने शव को शमशान घाट लेकर पहँचे तो शाम के करीब पाँच बजे थे। वहाँ का नजारा बहुत ही अद्भुत था। शमशान घाट पर शवो की लाईन लगी है। बिजली से चलने वाले शवदाह गृह में एक शव को शवदाह करने में लगभग एक घंटा लग रहा था। मेरे सहकर्मी का शव बारह नम्बर पर था।
शमशान घाट का नजारा बहुत ही चहल-पहल वाला था। जो भी लोग शवों को लेकर आते थे तो राम-राम सत्य है, सबकी यही गत है बोलते आते या कुछ लोग बोलते कि गंगाजी दूर है जाना जरूर है। कुछ शव तो बंगालियो के थे वह शायद राम को नहीं वह तो कृष्ण को मानने वाले थे। वह शव को लेकर आते तो आवाज लगाते- बोल हरि-बोल हरि।
शमशान घाट पर इंतजार करते-करते रात के करीब तीन बज गये। मेरे कुछ साथी शमशान पर बने दुकानों में चाय पी रहे थे। कुछ समय के बाद घाट पर एक और शव एक गाड़ी से आ गयी। उस गाड़ी में से दो महिलाएँ उतरी। वह पास में खड़े लोगो से निवेदन कर रही थी कि आप थोड़ा कंधा दे देगें क्या? घाट पर उपस्थित लोग बड़े ही सम्मान से शव को कंधा देकर शवदाह गृह के पास ले आये। वहाँ पर शव को अंतिम क्रिया करने के लिए शव को गाय का धी लेपन करना पड़ता था तथा गंगा का पानी से स्नान कराना पड़ता था। यह सब क्रिया मेरे मित्र सब कर दिये।
कुछ देर बाद मेरे सहकर्मी का शव का शवदाह किया गया। शमशान से आते-आते शुबह हो गयी। मैं जब घर पहुँचा तो बस एक ही बात समझ में आ रही थी कि मनुष्य पूरी ही जिंदगी बस यही प्रयास में रहता है कि आलीशान घर बना लू, मँहगी गाड़ी खरीद लू, जमीन खरीद लू, रूपये जमा कर लू पर मरने के बाद कुछ नहीं ले जा पाता है। वह तो खाली हाथ आता है और जिंदगी भर भौतिक चीजो की पकड़ने की कोशिश करता है पर जब वह मर जाता है सब कुछ यही रह जाता है मुट्ठी खुली रह जाती है ताकि लोग देख सके कि देखो मरने के बाद मनुष्य कुछ भी लेकर उपर नहीं जाता। वह केवल लेकर जाता है तो केवल व्यवहार। अपने किये हुए कर्म। दूसरो के लिए दिये गये योगदान।
मेरे मित्र की शमशान यात्रा में सैकड़ों लोग गये थे पर हाय रे किस्मत कि कुछ लोग को उठाने के लिए चार कंधे भी नहीं मिलते है। वह मनुष्य आखिर क्या कर्म किया कि उसको उठाने के लिए कंधे तक न मिले।
ये सब आधुनिक संस्कृति की देन है। बहु मंजिला इमारत रह रहे लोग अपने सामने का पड़ोसी कौन है शायद उसे हम पहचानते तक नहीं, न ही जान पहचान बनाने की कोशिश भी करते है, सोचते है कि कहीं बात-बात में हमारी नीजी जिंदगी में दखल दे बार-बार जो उसे पसंद नहीं है। तो आप सोच सकते है कि जब वह मर जायेगा तो उसे कंधा कौन देगा।
पर बोला जाता है न कि जिसका कोई नहीं उसका खुदा है यारों और यह सत्य भी है। जब तक मनुष्य में मनुष्यता थोड़ी बहुत बची रहेगी तो हम अपने शवों को सम्मान दे पाएँगे।
आप हमेशा ऐसा कर्म करे कि लोग आपके अंतिम यात्रा में आपके कंधा माँगने की जरूरत न हो लोग खुद-ब-खुद कंधा देने आये। वही आपकी पूरी जिंदगी की असली कमाई है। भौतिक चिजे तो वक्त के साथ मिट जाएगी पर आपके किए गये इस धरती पर अच्छे काम को लोग युग-युग तक याद करेंगे।
गिरधारी राम, दिनांकः 08.11.2017, सिलीगुड़ी
शनिवार, 8 सितंबर 2018
कंधा
एकांकीपन
पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था पर आज हम एकल परिवार में विश्वास रखते है। ग्रामीण अंचल में तो कुछ ठीक है पर शहरी अंचल में हम कुछ इस कदर एकांकीपन हो गये है कि हमारे फ्लैट के सामने कौन रहता है हमें पता तक नहीं होता है। दरअसल हम नहीं चाह रहे है कि हमारे निजी जिंदगी में किसी गैर की दखलअंदाजी हो। यह तो ठीक है कि निजी जिंदगी में किसी को भी दखलअंदाजी पसंद नहीं होता है पर हमे मानवता के नाते अपने आस-पास तो नजर रखनी ही पड़ेगी। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और बिना समाज के मनुष्य को कोई अस्तित्व नहीं होता। हर मनुष्य का सुख-दुख समाज के हर वर्ग के लोग बाँटते है तभी मनुष्य जिंदा रहता है अगर मनुष्य के अंदर से समाज शब्द का विलोपन हो जाय तो शायद मानव जाति ही खतरे में पड़ जायेगी।
अभी कल ही की तो बात है। मैं एक सहकर्मी के शवयात्रा में शामिल हुआ था। शवयात्रा में सौकड़ो लोग शामिल थे। जब लोग अंतिम संस्कार करने के लिए शमशान घाट पहुँचे तो लोगो का हुजुम कम नहीं हुआ। शमशान घाट पर सैकड़ो लोग इकट्ठा देख सहकर्मी के परिवार को बहुत संवेदना मिल रही थी। इस विपत्ति में इतने लोगो का साथ देखकर उनके मन में ढाढ़स था।
कुछ समय के उपरांत एक बूढ़ी महिला का शव लिए शवगाड़ी से एक आदमी अपनी एक बहन तथा अपनी पत्नी के साथ शमशान पहुँचा। शमशान में वह आदमी विनती करने लगा कि भईया शव को थोड़ा कंधा दे दिजिए। हमारे सहकर्मी के अंतिम यात्रा में शामिल लोग उसकी मदद किये।
बाद में पता चला कि ये शहरी पता चला कि ये शहरी फ्लैट कल्चर(संस्कृति) की उपजी हुई समस्या का परिणाम है। जहाँ अपने फ्लैट के सामने कौन रहता है हम उसको जानते तक नहीं और मुसिबत में शव को कंधा देने वाले भी नहीं मिलते।
गिरधारी राम, दिनांकः17.11.2017
वफादारी
एक कूड़ा बिनने वाला लड़का कोई चौदह-पंद्रह साल का होगा मैले-कुचले, फटे कपड़े पहन रखा था। शाम के समय कूड़ेदान के आस-पास कूड़ा बिन रहा था। उसके पास एक बोरी में कूड़ा इक्कठा हुए था ( उपयोगी कूड़े जैसे प्लास्टिक,लोहा, पेपर, या टूटी-फूटी चीजे जिसको रिसायकिल किया जा सके) और कुछ अभी ढूँढ रहा थातभी उसको आठ-दस की संख्या में कुत्ते उसको घेर लिए और जोर-जोर से भौंकने लगे, लगता था कि उस लड़के को अभी कुत्ते काट ही लेंगे चोर समझ कर।
वह लड़का रुक गया और घबराकर जोर-जोर से आवाज देने लगाः सुमित..........सुमित........सुमित......! तुम कहाँ हो.............?
अभि भी कुत्ते उसे घेरे हुए थे और उस लड़के को या उसके समान को नोचने वाले ही थे, फिर एक बार वह लड़का और जोर-जोर से आवाज देने लगाः सुमित.........सुमित............सुमित.............!
लड़के की आवाज सुनकर एक सफेद रंग का कुत्ता उन कुत्तो के पिछे से दुम हिलाता हुआ उस लड़के के पास पहुँच गया, वह लड़का कुत्ते को पुचकारने लगा और निर्भिक हो गया, तभी बाकी के कुत्ते वहाँ से दूर खिसक गये।
वह लड़का उस सुमित(कुत्ता) से बात कर रहा था और सुमित से बोलाः देखा सुमित ये सब मुझे काटने के लिए आये थे तुम आ गये तो ये कुत्ते सब जा रहे है।
वह कूड़ा वाला उस कुत्ते को रोज कुछ न कुछ खिलाता था आज उसका फर्ज निभाया था वफादारी निभाई उसको काटने से बचाकर।
सुमित ने तो वफादारी निभाई पर ये मनुष्य कब सबक लेगा? वह लड़का मन ही मन सोच रहा था।
दिनांकः07.11.2015,सिलीगुड़ी
गिरधारी राम
दुर्गा
यह कहानी एक पगली की है जिसका नाम था दुर्गा। ऐसा नहीं है कि पगली जन्म से ही मंद वुद्धि की थी पहले वह अच्छी थी। जब दुर्गा छोटी थी यानी यही कोई चार या पांच साल की रही होगी, स्कूल में जाना शुरू किया था। स्कूल में टीचर्स भी उसके प्रभाव से वंचित नहीं रह सके। कविता, छोटी कहानी, पहाड़ा तथा कोर्स की किताबें तो जैसे उसे मुंह जबानी याद है।
कुछ दिनों पहले की बात है एक दिन दुर्गा स्कूल से घर आ रही थी तभी से गायब हो गई थी। घर वाले खोजने की बहुत कोशिश की पर खोज न पाए।
काफी दिनों बाद दुर्गा मिली पर वह मानसिक विक्षिप्त हो गई थी। वह घरवालों को भी नहीं पहचानती भी नहीं थी। दुर्गा घर पर नहीं रहती। आज कल वह स्टेशन के आसपास ही रहती थी।
दुर्गा के अंदर एक बदलाव आया था। वह आजकल दुर्गा(देवी माँ) का रूप धारण करती थी। रूप-श्रृंगार करती माथे पर मुकुट लगाती तथा हाथ में त्रिशूल लेकर पूरे स्टेशन पर घूमती रहती।यह उसकी हर रोज की दिनचर्या थी।
मैं बहुत दिनों बाद उसकी मनोदशा समझ पाया था। दरअसल दुर्गा हर रोज महिसासुर को खोजती थी दुर्गा बनकर, जिससे वह बदला ले सके।
दिनांकः03.10.2017,सिलिगुड़ी,गिरधारी राम
मोबाइल नंबर
अभी इसी रविवार को मै और मेरा एक मित्र चौधरीजी अपने शहर के माल सिटी सेंटर गये हुए थे। पूर माल को घूमने के उपरांत आखिरकार हम लोग एक दुकान में घुस गये। चौधरीजी ने एक कपड़े का सेट तथा और भी कुछ जरूरत का समान खरीदा। जब वह काउंटर पर बिल को चुकाने लगे तो बिल बनाने वाला ने बड़े आग्रह और बड़े ही जरूरत से बोलाः सरजी आप अपना मोबाईल नम्बर बताये? चौधरीजी के पास मोबाईल नम्बर तो था पर उस दुकान पर देना नहीं चाह रहे थे क्योंकि मोबाईल नम्बर देने का नतीजा वह आज तक भुगत रहे है। उनके मोबाईल पर अनचाहा ऑफर की सूचना आज तक आ रहे है और कभी-कभी तो लोग फोन भी करते है, जिससे की उनको चाहे-अनचाहे में उनको डिस्टर्ब होना पड़ता था। चौधरीजी इन अनचाहे फोन और मैसेजो से बहुत तंग आ चुके थे। उनके मन में बहुत रंज था। एक बार फिर बिल बनाने वाला बोलाः सरजी आप अपना मोबाईल नम्बर बताये? चौधरीजी नें बहुत ही गुस्से से लाल-पीला होता हुए बोलेः मोबाईल नम्बर के साथ कहो तो मैं अपना वोटर कार्ड, राशन कार्ड और आधार नम्बर भी दे दूँ! चौधरीजी के गुस्सा वाला मूँड़ देखकर बिल बनाने वाला चौधरीजी का मुँह देखने लगा था। चौधरीजी और मैं दोनों सिटी सेंटर से इस नये जमाने का एक दम से नया अनुभव लेकर लौटे थे जहाँ पर कोई भी समान खरीदा तो मोबाईल नम्बर देना पड़ता है और शायद भविष्य में आधार नम्बर भी देना जरूरी हो जाय।
गिरधारी राम, 23.11.2017.
मुफ्त की शिक्षा
सिलीगुड़ी में कुछ महीनों से बिना हेलमेट के दो पहिया वाहन को पेट्रोल पंप पर पेट्रोल न देने का नियम लागू है। कुछ महीनें पहले ही राज्य सरकार नें सड़क सुरक्षा को देखते हुए सख्ती से लागू किया जा रहा है। पूरे शहर में बिना हेलमेट के दो पहिया सवार पेट्रोल नहीं ले सकते है।
अभी कल की ही बात है मैं अपनी मोटरसायकिल में पेट्रोल भरवाने के लिए पेट्रोल पंप खड़ा था। कुछ देर के पश्चात ही मुझें तेल मिल गया। मैने सोचा कि जब हवा भी फ्री में मिल रहा है तो क्यों न भरवा ही लिया जाय। हवा भरने वाला दूसरी गड़ी में हवा भर रहा था फिर मेरी गाड़ी करने वाला ही थी उसी समय एक बीस-बाईस साल का नौजवान मेरे पास आया और बोलाः भईया आप अपना हेलमेट देंगे क्या पेट्रोल लेना है। मैं उस नौजवान को अपनी मोटरसायकिल की तरफ इशारा करके कहा। यह देख रहो न? यह चेन है इसी में मैं अपना हेलमेट बाँधकर रखता हूँ और हेलमेट मेरे साथ हमेंशा ही रहता है। अगर एक्सीडेंट होता है तो किसकी जान जायेगी, किसका माथा फूटेगा। वह बेचारा बना मुझे देख रहा था। वह अब मेरी बात सुनने को तैयार नहीं था।
कुछ देर के उपरांत बोला आप अपना हेलमेट दे रहे कि नही? मैं पहले तो हेलमेट देने के मूँड में था पर उसकी प्रतिक्रिया देखकर ऐसा लग रहा है कि जैसे मै ही उसे परेशान कर रहा हूँ। मेरे मुँह से निकल ही गया मैं अपना हेलमेट नहीं देंगे तेल लेने के लिए। वह व्यक्ति मेरे उपर तो जैसे बिफर ही गया। और बोल जब हेलमेट देना नहीं था तो लेक्चर क्या दे रहे हो। वह गुस्से में था।
दरअसल मेरा बस यही उदेश्य था कि उस ब्यक्ति को एहसास दिलाना कि मुँझसे गलती हुई है पर उसको तो थोड़ा बहुत भी असर न था।
वह अगर प्यार से बोलता कि आज मुँझसे गलती हो गयी फिर ऐसा न करने की कोशिस करेंगे पर वह तो मेरे उपर ही गुस्सा कर रहा था। गलती कोई करता है और उसका साईड़ इफेक्ट कही और पड़ता है। उसी समय मैं सोच लिया कि मुफ्त में किसी को संदेश, शिक्षा कभी मत दीजिये क्योंकि मुफ्त की शिक्षा कोई नहीं लेता है।यही सोचते-सोचते मैं अपने घर की ओर लौट आया था।
दिनांकः 19.06.2018.सिलीगुड़ी, गिरधारी राम.
माँ का प्यार
राहुल इलाहाबाद में रहता था। वह वही पर रहकर पढ़ाई करता था। वह गर्मियों की छुट्टी या जब कोई त्योहार पड़ता तब ही घर जाता था। राहुल जब भी घर जाता तो उसकी माताजी बहुत सारी चीजें उसे बाँध देती थी कि राहुल को कुछ कमी न हो। दाल,चावल,देसी घी, अचार, पापड़, तथा बहुत सारी चीजे जिससे राहुल को कुछ परेशानी न हे। राहुल बहुत आदर से उसको ले आता था और पूरे तीन-चार महीने बड़े ही आराम से कट जाता था।
कुछ दिनों बाद ही राहुल की नौकरी लग गयी । वह अब घर जाता तो माँ को बोल देता कि माँ जब मैं अपने काम पर जाँऊ तो कुछ मत देना ट्रेन में बहुत ही परेशानी होती है। एक तो दो-दो बैग रहता है उपर से ये भरा हुआ बैग दे देती हो जिससे कि बहुत ही परेशानी होती है। राहुल अच्छी तरह जानता था कि माँ मानने वाली नहीं है।
इस बार गर्मियों की छुट्टी में फिर राहुल घर गया। जब आने लगा तो माँ ने फिर बहुत सारा समान बाँध दी थी। और बोली कि इसे कुली से चढ़वा लेना। राहुल अपनी माँ पर बहुत ही गुस्सा होता था। वह सारा सामान कहीं घर में ही छुपा दिया था। जब चलने लगा तो माँ वह बैग न देखकर ताड़ लिया और कहीं से खोजकर फिर वह बैग मेरे हवाले किया था। न चाहते हुए भी मुझें ले आना पड़ा था।
कुछ दिनों बाद ही राहुल की शादी हो गयी। एक नन्हा-मुन्ना भी घर में आ गया। राहुल फिर छुट्टीयों में घर आया था। जब फिर वह घर से जाने लगा तो माताजी ने इस बार कुछ ज्यादा ही सामान दे दी थी। स्टेशन पर किसी तरह से पहुँच गया था। जब ट्रेन आयी तो वह ट्रेन में चढ़ने नही सका था। एक तो पहले से ही तीन-चार बैग उसके पास थे और माताजी का दिया हुआ भी भारी बैग भी उसके पास था तथा उसकी पत्नी की गोंद में छोटा बच्चा था। बैग के चक्कर में राहुल पूरे फेमिली के साथ चढ़ नहीं पाया था।
राहुल का रिजर्वेशन में जो चार हजार रूपये लगाये थे वह अब उसकी वजह से पानी में चला गया था। एक दूसरी ट्रेन पकड़कर वह किसी तरह बहुत ही कठिनाई, बहुत ही तकलीफ से अपने ड्यूटी के स्थल पर आया था। कठिनाई इस कारण भी हुई कि बिना रिजर्वेशन के रेलगाड़ी के ए सी डब्बे में चढना कितना मुश्किल काम है वह वही समझ रहा था। राहुल अपनी माँ पर बहुल गुस्सा हो रहा था हद से ज्यादा प्यार की वजह से उसकी ट्रेन छूट गयी थी जिससे की उससे हजारों रूपयों का नुकसान हुआ था वह भी बहुत ही तुच्छ सामान जैसे कि दालें, चावल, देसी घी, अचार, तेल के लिए। एक बार तो फोन पर माँ को डाटा भी था कि माँ अब ज्याद ओवर एक्टिग न करों रखो यह सारा सामान वहाँ पर मिल जाता है आज इसकी वजह से ट्रेन में नहीं चढ़ पाया जिसकी वजह से मेरा हजारों रूपये नुकसान हो गया।
कुछ दिनों बाद ही राहुल की माँ अब न रही । अब राहुल जब भी घर आता और लौटने लगता तो सामानो से भरा बैग अब कोई देने वाला न रहा। राहुल को अचार, पापड़, अरहर की दाले बहुल ही पसंद थी। शहरों में लाख खोजने पर भी ये चीजें दुर्लभ न मिलती थी। माँ के बने हाथों के तो क्या कहने स्वाद लाजबाब होता था।
बहुत दिनों बाद वह अनुभव कर पाया था कि माँ दालें, चावल, देसी घी, अचार, पापड़, तेल या सामान ही नहीं देती थी वह तो अपना प्यार देती थी वह अब देने वाला कोई न रहा। वह आज घर से लौट रहा था और उसकी आँखें ढबढबा गयी थी। कुछ बूँदे आँसू के उसके चेहरे पर ढुलक गये थे उस बार जो ट्रेन छूट गयी थी उसका गम भी उसे न रहा प्यार के आगे वह आज नतमस्तक हो गया था।
दिनांकः 16.07.2018, सिलीगुड़ी, गिरधारी राम.